गांधी: एक व्यक्ति, चिंतन और सिद्धांत

    02-Oct-2019


 
by Shivam Singh Parihar 
 
वर्ष 2019 ने हम सभी को महात्मा गांधी (बापू) की 150वीं जयंती को मनाने का साक्षी बनाया है। गांधी आज भी हर भारतीयों के दिलों में जीवित हैं गांधी को कोई मार नहीं सकता क्योंकि गांधी अमर हैं।  गांधी एक व्यक्ति नहीं एक विचारधारा है जिसे हम गांधीवादी भी कहते हैं गांधी की एक व्यक्ति के रूप में आलोचना हो सकती है किंतु विचार और सिद्धांत के रूप में दुनिया में उनके जैसा कोई नहीं। 
 
गांधी के चिंतन एवं सिद्धांत की जड़ें दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुई। दक्षिण अफ्रीका उनकी ऐसी कर्मभूमि रही थी जिसने उन्हें मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनाया। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की शुरुआत गुजरात के पोरबंदर से शुरू होती हैं इनकी आत्मकथा से यह पता चलता है कि कैसे इन का बचपना दर्शन की ओर था। महात्मा ने अपने बचपन की शिक्षा पोरबंदर में ही की, बाकी विद्यालय शिक्षा भी भारत में ही ग्रहण की। वकालत की पढ़ाई करने के लिए वे लंडन  गए। लंडन से वकालत की पढ़ाई करके लौटने के बाद मोहनदास ने पहले बांबे उच्च न्यायालय और राजकोट में वकालत की। यह सन 1891- 1893 का दौर था।
  
यह समय उनके लिए कुछ ज्यादा अच्छा नहीं बीता परंतु नियति ने एक बार फिर करवट ली, उन दिनों दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक गुजराती व्यवसायी हुआ करते थे दादा अब्दुल्लाह, दादा अब्दुल्लाह के साथ उनके बिजनेस पार्टनर ने धोखाधड़ी कर दी थी। दादा अब्दुल्ला ने यह केस कोर्ट में लगा दिया था परंतु लेनदेन के सभी दस्तावेज गुजराती में थे जो अंग्रेजी वकील के समझ के परे थे तब यह वह वक्त था जब मोहनदास को एक सहायक के रूप में बुलाया गया। मोहनदास सहायक के तौर पर 7 जून 1893 को डरबन से प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए। फर्स्ट क्लास टिकट के साथ मोहनदास का सफर कुछ ज्यादा अच्छा तो नहीं बीत रहा था इसी बीच ट्रेन में कुछ गौरों द्वारा उनकी पिटाई कर दी जाती है और उन्हें मारकर पीटर मैरिसस्वर्ग स्टेशन पर उतार दिया जाता है। दादा अब्दुल्लाह के प्रयासों से अंततः उन्हें प्रिटोरिया पहुंचा दिया जाता है जहां कुछ दिनों बाद वह केस जीत जाते हैं।
 
महात्मा गांधी ने प्रत्येक वर्ग को जागृत किया किसान, महिला दलित या अल्पसंख्यक वर्ग इत्यादि गांधीजी कुलीन परिवार, दुकानदार, महिलाएं और छात्रों के समर्थक थे। दक्षिण अफ्रीका में गांधी अपने सिद्धांतों को साथ लेकर लड़ते रहे, उन दिनों अफ्रीका में काले - गोरे नस्लों के बीच भेद चरम पर था। वहां भारतीयों को सिर्फ तुच्छ की नजरों से देखा जाता था तब महात्मा गांधी ने 22 अगस्त 1894 को नेटल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की जिसमें 40000 से अधिक भारतीय उपस्थित हुए उन्होंने 1903 में साप्ताहिक पत्र इंडियन ओपिनियन लांच किया जिसने भारतीयों के साथ-साथ अफ्रीका में रंगभेद की दुर्दशा से भी अवगत कराया।
 
सन 1904 में जॉन रस्किन के ग्रामीण उपदेशों से प्रभावित होकर डरबन के पास ही 100 एकड़ मेंं एक फेनिक्स फॉर्म बसाया था। यह आश्रम सत्य और प्रेम को विकसित करने का साक्षी बना। हम कई बार एक शब्द का जिक्र करते हैं सत्याग्रह जिसका शाब्दिक अर्थ होता है सत्य के लिए आग्रह या दूसरे शब्दों में कहें तो सत्य हेतु किया गया अहिंसात्मक हठ। सत्याग्रह गांधीजी के सबसे सफलतम प्रयोगों में से एक था जिसके लिए उन्हें 1908 में पहली बार 2 महीने के लिए जेल भी भेजा गया था। गांधीजी के सत्याग्रह की जन्मस्थली दक्षिण अफ्रीका ही रही है। महात्मा गांधी अपने आप में एक सिद्धांत और एक दर्शन है उनके विचार अनंत काल के लिए मनुष्य की धरोहर है। यूं तो बापू बहोतों के आदर्श हैं परंतु कुछ ऐसे भी विश्व विख्यात व्यक्तित्व हैं जो महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे जैसे म्यांमार के ऑनसॉन्ग सूकी, यूएसए के मार्टिन लूथर किंग और दक्षिण अफ्रीका के नेलसन मंडेला, जो दक्षिण अफ्रीका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति थे।
 
महात्मा गांधी को सबसे पहले महात्मा नाम गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने 6 मार्च 1915 को दिया था। महात्मा गांधी यूंं तो "हिंदू वैष्णव" समाज से थे किंतु उनमें सर्व धर्म सम्‍भव: विध्‍मान था। भारत वापस लौटने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले उनके गुरु रहे उन्हीं के कहने पर महात्मा गांधी 1 वर्ष के लिए देश भ्रमण के लिए निकल पड़े थे। अफ्रीका में उत्पन्न हुए विचार और सिद्धांत को उन्होंने भारत में भी जारी रखा और मानव रूपी शरीर के अंतिम श्वास तक उसे जीवित रखा। भारतीय इतिहास में महात्मा गांधी ने छ: राष्ट्रीय आंदोलन किए। इस दौरान स्वदेशी खादी हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे मुद्दे परवान में थे।
 
महात्मा गांधी का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अविस्मरणीय सहयोग रहा है फिर चाहे वह चंपारण आंदोलन हो, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, दलित आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन इन सभी आंदोलनों ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़े उखाड़ कर रख दी थी और उन्हें भारत छोड़कर जाने को विवश कर दिया। गांधी ने अपने जीवन के सभी आंदोलनों में अपने सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं किया उन्होंने सिद्धांतों के मूल तत्वों में सत्य, अहिंसा, शाकाहारी रवैया, ब्रह्मचर्य, सादगी, विश्वास आदि शामिल थे।
 
गांधीजी ने अपनी ही आत्मकथा "द स्टोरी ऑफ माय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ" में दर्शन और अपने जीवन के मार्ग का वर्णन किया है, जिसमें गांधी जी की लिखी कुछ बातें उनके विचार-चिंतन को समझने में हमारी मदद कर सकती हैं, जो इस तरह से हैं-
 
"जब मैं निराश होता हूं तब मैं याद करता हूं कि हालांकि इतिहास सत्य का मार्ग है किंतु प्रेम इसे सदैव जीत लेता है।"
 
"यहां अत्याचारी और हत्यारे भी हुए हैं और कुछ समय के लिए वे अपराजय लगते थे किंतु, अंत में उनका पतन ही होता है, इसका सदैव विचार करें।"