नागरिकता बिल को मोदी और शाह की मंजूरी, लेकिन फिर क्यों मच रहा बवाल, लोग क्यों कर रहे विरोध

    04-Dec-2019

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केंद्र सरकार के केबिनेट ने नागरिकता बिल को मंजूरी दे दी है। वे 19 दिसंबर को इस संसद में बिल पेश करेंगे। नागरिकता बिल के लागू होने से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध पारसी, जैन और इसाई शरणार्थियों को बगैर बैध दस्तावेजों के भारत में नागरिकता दी जा सकेगी। लेकिन नागरिक उन लोगों के ही प्राप्त होगी जो कम से कम 6 साल पहले से भारत में रह रहे हों। बिल में पहले इसकी समय सीमा 11 वर्ष रखी गयी थी लेकिन इसे हटाकर अब 6 साल कर दी गई है।
 
गृह मंत्री अमित शाह देश के कई राज्यों में अपनी सभाओं में इस बिल को लागू करने की बात कह चपके हैं। जिसका कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में इसका विराध किया जा रहा है। 
 
क्या है नागरिकता संशोधन बिल?
 
केंद्र सरकार ने नागरिकता अधिनियम 1955 में बदलाव करने के लिए नागरिकता संसोधन बिल पेश किया है। इस बिल को 2016 में संयुक्त संसदीय समीति को सौंपा गया था जिसके बाद संसदीय समीति ने इसी साल जनवरी में इसकी रिपोर्ट दी थी। यदि ये बिल पास हो जाता है तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के 6 धर्मों के शरणार्थियों का भारत की नागरिकता प्राप्त करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
 
इस बिल को लेकर विपक्ष केंद्र सरकार को धर्म में भेदभाव करने पर घेर रहा है। विपक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार इस बिल में केवल मुस्लिमों को छोड़कर बाकी अन्य सभी धर्मों के लोगों को नागरिकता देने की बात कर रही है। विपक्ष इस आधार पर मोदी सरकार पर धर्म को बांटनें का इल्जाम लगा रही है।
 
इन 7 सात राज्यों को दिया था नागरिकता देने का कार्य 
 
गृह मंत्रालय ने 2018 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान को भारत में 11 वर्ष से ज्यादा रहने वाले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से सताए गए 6 धर्मों के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 6 के तहत नागरिकता प्रमाण पत्र देने का कार्य सौंपा था।
 
गृह मंत्रालय ने गैर-भारतीय अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन आवेदन करने को कहा था। इसमें नागरिकता प्रमाण पत्र देनें की शक्तियां केवल शहर के कलेक्टर को दी गई थी।